Health Campaign, India: भारत में खतरनाक पारा को खत्म करने के लिए मेडिकल जांच में नया मुहिम

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Health Campaign, India: पारा थर्मामीटर और ब्लड प्रेशर उपकरण: सुरक्षित जब तक टूटे नहीं

Health Campaign, India: मेडिकल जांच में इस्तेमाल होने वाला पारा हमारे शरीर और पर्यावरण के लिए अत्यंत खतरनाक है। पारा थर्मामीटर और ब्लड प्रेशर नापने वाले उपकरणों में प्रमुखता से उपयोग होता है। ये उपकरण तब तक सुरक्षित होते हैं जब तक वे टूटते नहीं हैं, लेकिन इनके टूटने पर पारा बाहर निकलकर हवा में मिल सकता है और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। पारे का संपर्क न्यूरोलॉजिकल समस्याएं, किडनी डैमेज और श्वसन तंत्र पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है।

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Health Campaign, India: इस खतरे को ध्यान में रखते हुए, भारत सरकार ने पारा के उपयोग को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की है। इस मुहिम के तहत 134 मिलियन डॉलर की राशि खर्च करके पारे से होने वाले नुकसान को पूरी तरह से खत्म करने की योजना बनाई गई है। इस योजना के अंतर्गत, पारा युक्त उपकरणों को धीरे-धीरे हटाकर उनकी जगह सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों का उपयोग किया जाएगा।

इसके अतिरिक्त, लोगों को पारे के खतरों के बारे में जागरूक करने के लिए भी कई कार्यक्रम चलाए जाएंगे। इस पहल का उद्देश्य न केवल लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा करना है, बल्कि पर्यावरण को भी पारे के दुष्प्रभावों से मुक्त करना है। इस मुहिम से उम्मीद है कि आने वाले समय में पारे के उपयोग को पूरी तरह समाप्त किया जा सकेगा और एक स्वस्थ और सुरक्षित पर्यावरण सुनिश्चित किया जा सकेगा।

अल्बानिया, बुर्किना फासो, भारत, मोंटेनेग्रो और युगांडा जैसे विविध देशों ने मिलकर स्वास्थ्य सेवाओं में पारे के प्रदूषण को रोकने का संकल्प लिया है। ये देश संयुक्त रूप से यह सुनिश्चित करेंगे कि अस्पतालों और चिकित्सा प्रक्रियाओं में पारे का उपयोग न्यूनतम हो। इसके लिए वे पारे के स्थान पर सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों का उपयोग बढ़ावा देंगे।

इस पहल के तहत, स्वास्थ्य सेवाओं में पारा युक्त उपकरणों जैसे थर्मामीटर और ब्लड प्रेशर मापने वाले उपकरणों का उपयोग धीरे-धीरे समाप्त किया जाएगा। इसके स्थान पर, डिजिटल थर्मामीटर और एनारॉयड स्फिग्मोमैनोमीटर जैसे सुरक्षित विकल्पों का प्रयोग किया जाएगा, जो स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए बेहतर हैं।

इसके अतिरिक्त, इन देशों में पारे के खतरों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए व्यापक स्तर पर अभियान चलाए जाएंगे। चिकित्सा कर्मियों को प्रशिक्षित किया जाएगा कि वे पारे के सुरक्षित निपटान और वैकल्पिक उपकरणों के उपयोग को प्राथमिकता दें। इस सामूहिक प्रयास का उद्देश्य न केवल लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा करना है, बल्कि पर्यावरण को भी पारे के हानिकारक प्रभावों से मुक्त करना है। इस मुहिम के माध्यम से एक सुरक्षित और स्वच्छ भविष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जा रहा है।

पहले समझिए पारा होता क्या है

पारा धरती में चट्टानों और कोयले के भंडारों में पाया जाने वाला एक प्राकृतिक तत्व है। रसायन शास्त्र की भाषा में इसे ‘Hg’ के प्रतीक से दर्शाया जाता है और इसका परमाणु क्रमांक 80 होता है। पारा मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है: साधारण (धात्विक) पारा, अकार्बनिक पारा यौगिक (जिनमें कार्बन नहीं होता), और मिथाइलपारा व अन्य कार्बनिक यौगिक (जिनमें कार्बन होता है)।

साधारण पारा धात्विक रूप में पाया जाता है और सामान्य तापमान पर तरल अवस्था में होता है। इसे अक्सर थर्मामीटर, बैरोमीटर और अन्य वैज्ञानिक उपकरणों में उपयोग किया जाता है। अकार्बनिक पारा यौगिक विभिन्न रासायनिक प्रक्रियाओं में उत्पन्न होते हैं और इनमें पारे के साथ ऑक्सीजन, क्लोरीन या अन्य तत्व मिलते हैं। ये यौगिक अक्सर उद्योगों में और बैटरियों में उपयोग किए जाते हैं।

मिथाइलपारा और अन्य कार्बनिक यौगिक पारा के सबसे खतरनाक रूपों में से एक होते हैं, जो जल निकायों में जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से बनते हैं और खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करके मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकते हैं। पारे के ये विभिन्न रूप पर्यावरण और जीवों पर अलग-अलग प्रकार के दुष्प्रभाव डालते हैं, जिससे इसका नियंत्रित और सुरक्षित उपयोग महत्वपूर्ण हो जाता है।

पारा तब पर्यावरण के लिए मुसीबत बन जाता है जब यह चट्टानों से निकलकर हवा और पानी में मिल जाता है। यह प्रक्रिया प्राकृतिक रूप से भी हो सकती है। ज्वालामुखी विस्फोट और जंगल की आग, दोनों ही पारे को हवा में छोड़ते हैं। हालांकि, पर्यावरण में पारे के ज्यादातर रिसाव के लिए इंसानों की गतिविधियां जिम्मेदार होती हैं। कोयला, तेल और लकड़ी को ईंधन के रूप में जलाने से पारा हवा में फैल सकता है।

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हवा में मौजूद यह पारा बारिश की बूंदों, धूल के कणों के साथ या फिर सीधे गुरुत्वाकर्षण के कारण जमीन पर गिर सकता है। एक बार जमीन या जल स्रोतों में पहुंचने के बाद, यह खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर सकता है और मछलियों, जानवरों और अंततः मनुष्यों के माध्यम से गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकता है। पारे का यह संचलन पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।

पारे की यह स्थिति न केवल पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करती है, बल्कि मानव स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती है, जिसमें न्यूरोलॉजिकल और श्वसन संबंधी समस्याएं शामिल हैं। इसलिए, पारे के उपयोग और उसके उत्सर्जन को नियंत्रित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि पारा पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए कम से कम खतरा बने, विभिन्न उपायों और जागरूकता अभियानों की आवश्यकता है।

कहां इस्तेमाल होता है पारा

दरअसल, सदियों से स्वास्थ्य क्षेत्र में दवाइयां बनाने और बीमारियों को मापने के लिए पारे का इस्तेमाल होता आ रहा है। पारा एक जहरीला पदार्थ है और इसका उपयोग थर्मामीटर और ब्लड प्रेशर मापने की मशीनों में किया जाता है। ये दोनों ही उपकरण अस्पतालों में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और इनका उपयोग व्यापक रूप से किया जाता है।

हालांकि, जब तक थर्मामीटर और ब्लड प्रेशर मापने की मशीनों में पारा ठीक से भरा रहता है, तब तक कोई नुकसान नहीं होता। यदि ये उपकरण टूट जाएं, तो पारा बाहर निकलकर हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। पारा का संपर्क त्वचा, आंखों और श्वसन तंत्र के लिए हानिकारक हो सकता है और इसके कारण न्यूरोलॉजिकल समस्याएं भी उत्पन्न हो सकती हैं।

इसलिए, पारे के उपयोग को कम करने और इसके सुरक्षित विकल्पों को अपनाने की दिशा में जागरूकता बढ़ाना आवश्यक है। आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं में डिजिटल थर्मामीटर और एनारॉयड स्फिग्मोमैनोमीटर जैसे उपकरणों का उपयोग बढ़ रहा है, जो पारे की तुलना में सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल हैं। इस दिशा में प्रयास करके हम पारे से होने वाले खतरों को कम कर सकते हैं और एक सुरक्षित स्वास्थ्य वातावरण सुनिश्चित कर सकते हैं।

ये पारा इंसान को कैसे नुकसान पहुंचाता है

कुछ थर्मामीटर और ब्लड प्रेशर मापने की मशीनें अक्सर टूट जाती हैं और इनमें भरा हुआ पारा वातावरण में फैल जाता है। यह पारा हवा में मिलकर गैस के रूप में परिवर्तित हो जाता है, जिससे आसपास के लोगों को जहरीला धुआं परेशान कर सकता है।

यदि कोई गलती से इस हवा को सांस में ले लेता है, तो उसके फेफड़ों, किडनी और नर्वस सिस्टम को गंभीर नुकसान हो सकता है। इतना ही नहीं, टूटी हुई मशीनों से निकला हुआ पारा आसपास की जगह और अस्पताल के गंदे पानी को भी दूषित कर सकता है, जिससे जल स्रोतों में पारा मिलकर व्यापक पर्यावरणीय संकट पैदा कर सकता है।

पारे का यह रिसाव स्वास्थ्य सेवाओं और पर्यावरण दोनों के लिए खतरा बन जाता है। इसलिए, थर्मामीटर और ब्लड प्रेशर मापने की मशीनों के सुरक्षित उपयोग और निपटान के लिए सख्त उपायों की आवश्यकता है। इसके अलावा, आधुनिक और सुरक्षित उपकरणों जैसे डिजिटल थर्मामीटर और एनारॉयड स्फिग्मोमैनोमीटर का उपयोग बढ़ावा देना चाहिए ताकि पारे से होने वाले खतरों को कम किया जा सके।

सुरक्षा और जागरूकता के माध्यम से हम पारे के प्रदूषण को नियंत्रित कर सकते हैं और एक सुरक्षित एवं स्वस्थ वातावरण सुनिश्चित कर सकते हैं।

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पारे के संपर्क कैसे आते हैं हम?

यूनाइटेड स्टेट्स एनवायरनमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी के अनुसार, लोग आमतौर पर पारे के संपर्क में तब आते हैं जब वे ऐसी मछली और सीप का सेवन करते हैं जिनके शरीर में मिथाइलपारा नामक जहरीला पदार्थ जमा हो जाता है। मिथाइलपारा पारे का एक अत्यंत विषैला रूप है।

जब पारा वातावरण में फैलता है, तो यह जल निकायों में पहुंचता है और सूक्ष्मजीवों द्वारा मिथाइलपारा में परिवर्तित हो जाता है। यह मिथाइलपारा मछलियों और अन्य जलीय जीवों के शरीर में जमा हो जाता है और खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मनुष्यों तक पहुंचता है। मछलियों और समुद्री जीवों का नियमित सेवन करने वाले लोग विशेष रूप से इस खतरे के प्रति संवेदनशील होते हैं।

मिथाइलपारा का मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। यह नर्वस सिस्टम, किडनी और हृदय पर विपरीत असर डाल सकता है। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों के लिए यह अत्यंत हानिकारक हो सकता है, क्योंकि यह भ्रूण के विकास में बाधा डाल सकता है और बच्चों के न्यूरोलॉजिकल विकास को प्रभावित कर सकता है।

इससे बचने के लिए, लोगों को उच्च पारा स्तर वाली मछलियों का सेवन कम करना चाहिए और पारे के स्रोतों को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए। जागरूकता और उचित नीतियों के माध्यम से पारे के इस गंभीर खतरे को कम किया जा सकता है।

हवा में मौजूद पारे के संपर्क में आने का जोखिम थोड़ा कम होता है। यह जोखिम तब होता है जब किसी डिब्बे या टूटे हुए उपकरण से पारा निकल जाता है। यदि इस पारे को तुरंत साफ नहीं किया जाए, तो यह हवा में मिलकर एक गैस के रूप में परिवर्तित हो जाता है। इस गैस को हम देख नहीं सकते और न ही इसकी कोई गंध होती है, लेकिन यह अत्यंत जहरीला होता है।

जब पारा हवा में फैलता है, तो इसके संपर्क में आने वाले लोगों को गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। पारे की गैस के संपर्क में आने से फेफड़ों, किडनी और नर्वस सिस्टम पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा, यह गैस वातावरण में दूर-दूर तक फैल सकती है, जिससे व्यापक क्षेत्र में जोखिम बढ़ जाता है।

इससे बचने के लिए, पारे के स्रोतों को सुरक्षित रूप से संभालना और टूटे हुए उपकरणों से पारे को तुरंत साफ करना आवश्यक है। उचित सुरक्षा उपायों और जागरूकता के माध्यम से हम पारे के संपर्क में आने से होने वाले खतरों को कम कर सकते हैं और एक सुरक्षित पर्यावरण सुनिश्चित कर सकते हैं। पारे से जुड़े उपकरणों का सही निपटान और सुरक्षित विकल्पों का उपयोग इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।

क्या है पारा का इस्तेमाल खत्म करने वाला प्रोजेक्ट

यूनाइटेड नेशन्स एनवायरनमेंट प्रोग्राम (UNEP) के नेतृत्व में, ग्लोबल एनवायरनमेंट फैसिलिटी (GEF) के फंड से और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सहयोग से चलाए जा रहे इस प्रोजेक्ट का नाम है – ‘हेल्थकेयर सेक्टर में पारा मापने वाले उपकरणों को खत्म करना’। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य ऐसी रणनीतियां बनाना और लागू करना है, जिससे थर्मामीटर और ब्लड प्रेशर मापने की मशीनों के आयात, निर्यात और निर्माण को रोका जा सके।

यह प्रोजेक्ट पांच साल तक चलेगा और इसका मुख्य लक्ष्य इन देशों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाई जाने वाली अच्छी आदतों को लागू करना है। इस पहल के तहत, पारे से होने वाले खतरों को कम करने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे और पारे के सुरक्षित विकल्पों को अपनाने के लिए नीतियां बनाई जाएंगी।

इस प्रोजेक्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी है कि स्वास्थ्य सेवाओं में काम करने वाले लोगों को प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे पारे के सुरक्षित निपटान और वैकल्पिक उपकरणों के उपयोग को समझ सकें और उसका पालन कर सकें। इस तरह, यह प्रोजेक्ट न केवल पारे के उपयोग को कम करेगा बल्कि पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा को भी बढ़ावा देगा।

यूएनईपी के इंडस्ट्री एंड इकनॉमी डिविजन की डायरेक्टर शीला अग्रवाल-खान ने कहा, “हमें इसे वन हेल्थ के नजरिए से देखने की जरूरत है। यह पहल सिर्फ हमारी सेहत की रक्षा के लिए ही नहीं बल्कि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्वास्थ्य सेवाओं का हमारे पर्यावरण पर पड़ने वाला असर कम होता है।”

उन्होंने आगे कहा, “पारा मापने वाले उपकरणों को खत्म करने का प्रयास हमारे पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए संवेदनशीलता का संकेत है। इससे न केवल हमारे वातावरण को बचाया जा सकता है बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता भी बढ़ सकती है।”वह इस इनिशिएटिव को सफल बनाने के लिए साथ में काम करने की भी बात कहते हुए बताती हैं कि इसमें सभी तरह की सामाजिक वर्गों, उद्यमियों, निगमों और सरकारी अधिकारियों को शामिल किया जाएगा।

शीला अग्रवाल-खान ने अंत में कहा, “इस प्रक्रिया में सहयोग करके, हम स्वस्थ और सुरक्षित भविष्य की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं और पारा से होने वाले हानिकारक प्रभावों को कम करने में मदद कर सकते हैं।”

कितने लोगों की जीवन में सुधार ला सकता है ये प्रोजेक्ट?

यह प्रोजेक्ट हर साल 20% की दर से पारा वाले थर्मामीटर और ब्लड प्रेशर मापने की मशीनों को खत्म करने का लक्ष्य रखता है। इस प्रोजेक्ट से 23,350 किलो पारे के रिसाव को रोका जा सकेगा और 18 लाख से ज्यादा लोगों के जीवन में सुधार होगा।यह पहल पारा के वातावरणीय प्रभावों को कम करने के लिए अहम है। इससे न केवल स्वास्थ्य सेवाओं में पारा के इस्तेमाल का कम होना संभव है, बल्कि इससे पारा के नकारात्मक प्रभावों को भी कम किया जा सकता है।यह प्रोजेक्ट सामाजिक और वातावरणीय लाभों का भी समर्थन करेगा। इसके माध्यम से सामाजिक अधिकारी, उद्यमियों, निगमों और सरकारी अधिकारियों को समेत अधिक से अधिक लोगों को इस उत्साही प्रमुखता में शामिल किया जाएगा।

इस तरह, यह प्रोजेक्ट संभावित नुकसानों को रोककर वातावरण और स्वास्थ्य को सुरक्षित और स्वस्थ बनाने के माध्यम से लोगों के जीवन को सुधारेगा।

बुर्किना फासो के स्वास्थ्य मंत्रालय में पब्लिक हाइजीन की डायरेक्टर डॉ अंता जिदा ने बताया कि उनका देश अंतरराष्ट्रीय ज़िम्मेदारियों को पूरा करने के लिए अपने स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में सुधार करने की अहमियत को अच्छी तरह समझता है। स्वास्थ्य सुविधाओं में पारा युक्त उपकरणों को खत्म करना न सिर्फ पर्यावरण की रक्षा करता है बल्कि लोगों की जान भी बचाता है।

उन्होंने कहा, “हमारा उद्देश्य है कि हम अपने स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को पारा मुक्त बनाएं, जिससे हमारे लोगों को स्वस्थ्य और सुरक्षित रखा जा सके।”वह आगे बताती हैं, “इस कार्यक्रम के अंतर्गत हमने पारा युक्त उपकरणों की खरीदारी को बंद कर दिया है और साथ ही उन्हें बदलने के लिए सुरक्षित और अस्वास्थ्यकर उपकरणों को खरीदने की प्रक्रिया शुरू की है।”विश्व स्वास्थ्य संगठन में जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण और स्वास्थ्य विभाग की डायरेक्टर डॉ मारिया नेइरा ने कहा, “स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र का काम जनता के स्वास्थ्य की रक्षा और सुधार करना है। ये प्रोजेक्ट इस बात को और मजबूत करेगा कि कैसे स्वास्थ्य क्षेत्र स्थायित्व को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभा सकता है।”

उन्होंने आगे कहा, “इस प्रोजेक्ट के माध्यम से हम स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में पारा मुक्त उपकरणों को प्रोत्साहित करने और नई तकनीकों का उपयोग करके विनियमित करेंगे। इससे स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा में सुधार होगा और उन्हें स्थिर और दिग्गज उपचार मिलेगा।”

डॉ नेइरा ने इस प्रोजेक्ट की महत्वपूर्ण भूमिका पर बल दिया और कहा कि इससे अन्य स्वास्थ्य सेवा तंत्रों को भी प्रेरित किया जा सकता है ताकि वे भी पारा मुक्त और उत्कृष्ट सेवाएं प्रदान कर सकें।

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क्या है यूनाइटेड नेशन्स एनवायरनमेंट प्रोग्राम

यूनाइटेड नेशन्स एनवायरनमेंट प्रोग्राम (UNEP) पर्यावरण के मुद्दों पर दुनियाभर में सबसे अहम आवाज है। इस प्रोग्राम का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण की देखभाल करना है और इसके लिए देशों और लोगों को प्रेरित, सूचित और सक्षम बनाकर नेतृत्व प्रदान करता है। इसका मकसद है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण को खराब किए बिना, आज के लोगों का जीवन स्तर बेहतर बनाया जा सके।

विश्व स्वास्थ्य संगठन दुनियाभर के लोगों का स्वास्थ्य सुधारने के प्रति समर्पित है। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य है कि हर किसी को हर जगह एक स्वस्थ जीवन जीने का समान मौका मिले। इसके लिए यह संगठन दुनियाभर में नेतृत्व करता है और उनका समर्थन करता है। इस प्रकार, स्वास्थ्य सेवाओं के विकास के माध्यम से समृद्धि को सुनिश्चित करने का काम किया जाता है। इसके अलावा, यह संगठन स्वास्थ्य विकास को बढ़ावा देने में सहायक रहता है और लोगों को समर्थन प्रदान करता है। इस प्रकार, यह दोनों स्वास्थ्य और पर्यावरण के मामलों में वृद्धि और समृद्धि की दिशा में काम करता है।

 

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