Climate change: सेहत ही नहीं, आपकी गरीबी भी बढ़ा रहा है!

Climate change: सेहत ही नहीं, आपकी गरीबी भी बढ़ा रहा है!

Climate change: ग्लोबल वार्मिंग दुनिया की प्रगति में बड़ी बाधा है। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए केवल प्रदूषण कम करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके प्रभावों से बचने के लिए खुद को तैयार करना भी आवश्यक है।

Climate change: सेहत ही नहीं, आपकी गरीबी भी बढ़ा रहा है!
Climate change: सेहत ही नहीं, आपकी गरीबी भी बढ़ा रहा है!

Climate change: पृथ्वी के बढ़ते तापमान का असर सिर्फ ग्लेशियरों के पिघलने या मौसम के बिगड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी आर्थिक स्थिति पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। हाल ही में दो महत्वपूर्ण रिपोर्ट्स ने जलवायु परिवर्तन के खतरों को उजागर किया है और इसके व्यापक प्रभावों के प्रति चेतावनी दी है।

Climate change: पहली रिपोर्ट में बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि उत्पादन में कमी आ रही है, जिससे खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं। इससे न केवल किसानों की आय प्रभावित हो रही है, बल्कि आम लोगों के लिए भी भोजन महंगा हो रहा है। दूसरी रिपोर्ट में यह दर्शाया गया है कि बढ़ते तापमान के कारण स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ रही हैं। गर्मी के कारण बीमारियों का प्रकोप बढ़ता जा रहा है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ रहा है और चिकित्सा खर्चों में वृद्धि हो रही है।

Climate change: इन रिपोर्ट्स के निष्कर्ष स्पष्ट करते हैं कि जलवायु परिवर्तन का असर व्यापक है और यह हमारी आर्थिक संरचना को कमजोर कर रहा है। इसके प्रभावों से निपटने के लिए प्रदूषण नियंत्रण के साथ-साथ हमें अपनी सामाजिक और आर्थिक नीतियों में भी आवश्यक बदलाव करने होंगे ताकि हम भविष्य में आने वाली चुनौतियों का सामना कर सकें।

Climate change: अमेरिका के नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च (NBER) के अर्थशास्त्रियों की एक नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि यदि 1960 से 2019 के बीच ग्लोबल वार्मिंग नहीं होती, तो आज दुनिया की जीडीपी (GDP) 37% अधिक होती। यह रिसर्च यह भी बताती है कि ग्लोबल वार्मिंग का आर्थिक नुकसान पहले के अनुमानों से कहीं अधिक है, शायद 6 गुना ज्यादा।

Climate change: इसका मुख्य कारण यह है कि यह अध्ययन न केवल वैश्विक स्तर पर बल्कि स्थानीय स्तर पर भी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को शामिल करता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन से फसल उत्पादन, मानव स्वास्थ्य, और श्रम उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, जिससे आर्थिक विकास बाधित हुआ है। इसके अलावा, बढ़ते तापमान के कारण प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता में भी वृद्धि हुई है, जिससे बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा है और पुनर्निर्माण पर भारी खर्च आया है।इस रिसर्च का निष्कर्ष स्पष्ट करता है कि जलवायु परिवर्तन का आर्थिक प्रभाव अत्यधिक व्यापक और गंभीर है। इसके निराकरण के लिए हमें न केवल पर्यावरणीय नीतियों को सुदृढ़ करना होगा बल्कि आर्थिक नीतियों में भी आवश्यक सुधार करने होंगे ताकि भविष्य में इस प्रकार के आर्थिक नुकसान को रोका जा सके।

Climate change: इसी तरह की एक और रिसर्च पिछले महीने नेचर जर्नल में प्रकाशित हुई थी, जिसमें बताया गया था कि अगर जलवायु परिवर्तन नहीं होता, तो अगले 26 सालों में औसत आमदनी अभी के मुकाबले 20% ज्यादा होती।

Climate change: दोनों ही रिसर्च इस बात पर एकमत हैं कि ग्लोबल वार्मिंग का आर्थिक खर्च, जीवाश्म ईंधन से होने वाले नुकसान से कहीं ज्यादा है। ये शोध लू, बाढ़, तूफान और जलवायु परिवर्तन के अन्य बुरे प्रभावों को ध्यान में रखते हैं, जो लोगों की सेहत पर असर डालते हैं। इसके परिणामस्वरूप, उनकी काम करने की क्षमता घट जाती है और उनकी रोज़ी-रोटी पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

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Climate change: रिसर्च में यह भी पाया गया कि जलवायु परिवर्तन से होने वाले ये नुकसान सीधे तौर पर आर्थिक विकास को धीमा कर रहे हैं। जैसे-जैसे प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता और आवृत्ति बढ़ती है, वैसे-वैसे बुनियादी ढांचे को भी अधिक नुकसान पहुँचता है, जिससे पुनर्निर्माण के लिए भारी खर्च करना पड़ता है। इसके अलावा, इन आपदाओं से स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ती हैं, जो चिकित्सा खर्चों में वृद्धि का कारण बनती हैं।

अतः स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन के आर्थिक और सामाजिक प्रभाव गंभीर हैं और इनसे निपटने के लिए तुरंत और प्रभावी कदम उठाना आवश्यक है।

कैसे दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक तस्वीर बदल रही

Climate change: जलवायु परिवर्तन सिर्फ मौसम में बदलाव नहीं ला रहा है बल्कि यह पूरी दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक तस्वीर को भी बदल रहा है। बढ़ता तापमान, बारिश के पैटर्न में परिवर्तन, और चरम मौसम की घटनाएँ खेती के लिए उपयुक्त क्षेत्रों का नक्शा बदल रही हैं।

उदाहरण के लिए, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के पहले से उपजाऊ इलाकों में सूखे और रेगिस्तान के विस्तार के कारण फसल उत्पादन में कमी आ रही है। इसका परिणामस्वरूप वहां खाने की कमी हो रही है और आर्थिक अस्थिरता बढ़ रही है।

इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के कारण आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि हो रही है, जिससे बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुँचता है और पुनर्निर्माण पर भारी खर्च करना पड़ता है। इन घटनाओं से न केवल कृषि प्रभावित होती है, बल्कि उद्योग और सेवाओं पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिससे आर्थिक विकास धीमा हो जाता है।सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से भी जलवायु परिवर्तन गंभीर समस्याएं पैदा कर रहा है। खाद्य और जल की कमी से जनसंख्या का विस्थापन हो रहा है, जिससे संघर्ष और अस्थिरता की स्थिति उत्पन्न हो रही है। अतः, जलवायु परिवर्तन के आर्थिक और सामाजिक प्रभावों को कम करने के लिए तत्काल और प्रभावी नीतियों की आवश्यकता है।

Climate change: जलवायु परिवर्तन से पानी की कमी बढ़ रही है, जिससे देशों के बीच जल को लेकर विवाद बढ़ रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, नील नदी के पानी को लेकर अफ्रीकी देशों में तनाव बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण नील नदी का जलस्तर घट रहा है, जिससे खेती, बिजली उत्पादन और अन्य आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

Climate change: पानी की कमी से कृषि क्षेत्रों में सिंचाई की समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं, जिससे फसल उत्पादन कम हो रहा है। इसके अलावा, बिजली उत्पादन के लिए जलाशयों पर निर्भरता भी प्रभावित हो रही है, जिससे ऊर्जा संकट पैदा हो रहा है। इन समस्याओं से स्थानीय अर्थव्यवस्थाएँ कमजोर हो रही हैं और बेरोजगारी बढ़ रही है।नील नदी के आसपास बसे देशों में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न जल संकट के कारण तनाव और संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो रही है। देशों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर विवाद बढ़ रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता खतरे में पड़ रही है।

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Climate change: अतः, जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न जल संकट को हल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और समन्वय आवश्यक है। जल प्रबंधन की समग्र नीतियों और सतत विकास के उपायों को अपनाकर ही हम इस चुनौती का सामना कर सकते हैं।जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न आपदाओं के कारण लोग अपने घर छोड़कर दूसरी जगहों पर जाने को मजबूर हो रहे हैं। इससे उन नई जगहों पर रहने वाले लोगों के लिए आर्थिक चुनौतियाँ उत्पन्न हो रही हैं और संसाधनों को लेकर विवाद बढ़ रहे हैं।

उदाहरण के लिए, एक रिसर्च के अनुसार, बांग्लादेश में समुद्र के बढ़ते जलस्तर के कारण 2050 तक लगभग 17% तटीय इलाकों के डूबने और 2 करोड़ लोगों के बेघर होने का अनुमान है। तटीय इलाकों के डूबने से लोग आंतरिक क्षेत्रों में पलायन करने को मजबूर होंगे, जिससे जनसंख्या का दबाव बढ़ेगा और संसाधनों की मांग में वृद्धि होगी।

Climate change: इस पलायन के कारण नए क्षेत्रों में रोजगार, आवास, और बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न होंगी। इसके साथ ही, स्थानीय निवासियों और नए प्रवासियों के बीच संसाधनों के बंटवारे को लेकर संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है।आर्थिक दृष्टि से, बड़ी संख्या में लोगों के विस्थापन से स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं पर भारी बोझ पड़ेगा। इसके अलावा, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवाओं पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

अतः, जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न इस संकट का समाधान करने के लिए हमें दीर्घकालिक और समन्वित नीतियों की आवश्यकता है, जिससे प्रभावित लोगों को सहायता मिल सके और स्थायी विकास सुनिश्चित हो सके।

दुनिया की अर्थव्यवस्था में मच रही उथल-पुथल, कैसे?

Climate change: जलवायु परिवर्तन चिंता का विषय तो है, लेकिन इसके कुछ अप्रत्याशित फायदे भी सामने आ रहे हैं। जैसे-जैसे आर्कटिक क्षेत्र का बर्फ का आवरण पिघल रहा है, जहाजों के लिए नए मार्ग खुल रहे हैं और प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच आसान हो रही है।

Climate change: इससे समुद्री परिवहन में समय और ईंधन की बचत हो रही है, जो वैश्विक व्यापार के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। आर्कटिक क्षेत्र में तेल, गैस, और खनिज संसाधनों की प्रचुरता के कारण इन तक पहुंच आसान हो रही है, जिससे इन संसाधनों का दोहन संभव हो रहा है।

Climate change: इन संभावनाओं के कारण इस क्षेत्र में दिलचस्पी रखने वाले देशों के बीच आर्थिक होड़ लगने की संभावना है। रूस, कनाडा, अमेरिका, और अन्य आर्कटिक देशों के बीच इस क्षेत्र के संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।

हालांकि, यह महत्वपूर्ण है कि इन नए अवसरों का लाभ उठाते समय पर्यावरणीय संतुलन और सतत विकास को ध्यान में रखा जाए। आर्कटिक क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र नाजुक है और बिना सावधानी के किए गए दोहन से दीर्घकालिक पर्यावरणीय नुकसान हो सकता है।

इसलिए, यह आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय मिलकर आर्कटिक क्षेत्र के विकास और संरक्षण के लिए समन्वित प्रयास करे, ताकि इन नए अवसरों का सही ढंग से और संतुलित तरीके से लाभ उठाया जा सके।

वहीं, जलवायु परिवर्तन आग में घी डालने का काम कर रहा है। जहां पहले से ही राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक चुनौतियां मौजूद हैं, वहां संसाधनों को लेकर तनाव और बढ़ रहा है। उदाहरण के लिए, सीरिया में 2007 से 2010 तक पड़े लंबे सूखे ने वहां के गृहयुद्ध को भड़काने में बड़ी भूमिका निभाई।

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Climate change: मौसम की मार और जलवायु परिवर्तन से होने वाली आपदाएं वैश्विक सप्लाई चेन को बाधित कर रही हैं, जिससे आर्थिक नुकसान हो रहा है और आवश्यक वस्तुओं की कमी हो सकती है। जैसे, 2011 में थाईलैंड में आई बाढ़ ने इलेक्ट्रॉनिक्स और ऑटोमोबाइल पार्ट्स की सप्लाई चेन को पूरी तरह हिला दिया था। इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ा था।इन आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में उत्पादन रुकने से वैश्विक बाजार में वस्तुओं की उपलब्धता कम हो जाती है, जिससे कीमतें बढ़ जाती हैं और व्यापार में बाधा उत्पन्न होती है। इसके अलावा, परिवहन और लॉजिस्टिक्स पर भी भारी असर पड़ता है, जिससे आपूर्ति श्रृंखला की विश्वसनीयता कम हो जाती है।

अतः, जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए हमें अधिक प्रभावी और समन्वित प्रयास करने होंगे। इसमें न केवल पर्यावरण संरक्षण महत्वपूर्ण है, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता को बनाए रखना भी आवश्यक है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और दीर्घकालिक योजनाओं की आवश्यकता है।

जलवायु परिवर्तन की चपेट में कौन से इलाके

Climate change: जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हर जगह एक समान नहीं है, कुछ क्षेत्रों में इसका अधिक प्रभाव हो रहा है। विशेषकर, सूखे इलाकों में, जहाँ की इकोसिस्टम के बारे में हमारे पास कम जानकारी है। हाल ही में UN की एक रिपोर्ट ने ऐसे ही एक इलाके रेंजलैंड (जिसमें रेगिस्तानी झाड़ियां, पहाड़ी चारागाह, टुंड्रा और पठार शामिल हैं) पर जलवायु परिवर्तन के खतरनाक असर को उजागर किया है।

Climate change: इस रिपोर्ट के अनुसार, इस इलाके में से 50% से अधिक इकोसिस्टम बर्बाद हो चुके हैं। यहाँ प्राकृतिक जीवन और पारिस्थितिकी संरचना पर गहरा प्रभाव पड़ा है, जिससे पर्यावरणीय संतुलन में विपरीतता उत्पन्न हुई है। इससे प्रदूषण, बाढ़, सूखा, और जलवायु परिवर्तन के अन्य दुर्भाग्यपूर्ण प्रभाव बढ़ गए हैं।इस स्थिति को सुधारने के लिए आवश्यक है कि हम समुदाय, सरकार, और वैज्ञानिकों के सहयोग से समुदायिक स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन में नई नीतियों को प्रोत्साहित करें। इसके लिए साझेदारी, जागरूकता, और संज्ञानात्मक शिक्षा की आवश्यकता है ताकि हम संरक्षित एवं स्थिर पर्यावरण के साथ हमारे भविष्य को सुरक्षित बना सकें।

Climate change: पर्यावरण संरक्षण की बात आने पर जंगलों को जितनी अहमियत दी जाती है, उतनी ही रेंजलैंड को नहीं दी जाती, जबकि ये भी उतने ही जरूरी है। भारत में भी ऐसी जगहें हैं, जहाँ के लोग इन रेंजलैंड पर निर्भर हैं जैसे कि मालधारी, वन गुर्जर और रबारी। इन लोगों की जिंदगी और इनके रहन-सहन को बचाना, साथ ही इन्हें आधुनिक अर्थव्यवस्था में शामिल करना एक बड़ी चुनौती है।

Climate change: ये समुदाय अपनी जिंदगी को जंगलों से जुड़े हुए हैं। उनका आदिवासी जीवनशैली और आर्थिक व्यवस्था में वृद्धि के लिए उन्हें सामूहिक रूप से समर्थन और सुरक्षा की आवश्यकता है। उनकी संस्कृति, जैविक जनसंख्या, और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग समझना और सम्मान करना आवश्यक है।साथ ही, यह भी माना जाता है कि जंगली अंशों को संरक्षित रखना भी आवश्यक है ताकि प्राकृतिक परिस्थितियों का संतुलन बना रहे और उनके संसाधनों का उपयोग सुरक्षित तरीके से हो सके। इसमें सरकार, सामुदायिक संगठन, और आर्थिक संस्थाएं सहायक हो सकती हैं।

भारत की अर्थव्यवस्था को कैसे नुकसान हो सकता है?

Climate change: जलवायु परिवर्तन का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी स्पष्ट रूप से दिख रहा है। भारत की लगभग 55% आबादी खेती पर निर्भर है और यह हमारी अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा है। फसलों की पैदावार में कमी होने से गांव की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव पड़ेगा और शहरों में महंगाई बढ़ सकती है।एक अनुमान के मुताबिक, अगर हम जलवायु परिवर्तन से बचाव के लिए कोई कदम नहीं उठाते हैं, तो 2050 तक भारत में बारिश पर निर्भर धान की पैदावार 20% तक कम हो सकती है। यह खतरनाक हो सकता है क्योंकि धान हमारे देश की मुख्य खाद्य सरंचना में से एक है।

Climate change: इससे न केवल कृषि खेती में बदलाव आ सकता है, बल्कि इससे शहरों में भी खाद्य मांग में वृद्धि, बढ़ती महंगाई, और आर्थिक अस्थिरता जैसी समस्याएं आ सकती हैं। इसलिए, जलवायु परिवर्तन के प्रति सतर्कता और संज्ञान बढ़ाना हमारे लिए आवश्यक है ताकि हम सावधानी से इसे नियंत्रित कर सकें और आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित कर सकें।

इसके अलावा, कारखानों के लिए नए नियम-कानून बनेंगे जिससे उनकी लागत बढ़ सकती है और मुनाफा कम हो सकता है। पुराने स्टॉक का इस्तेमाल कम करना पड़ेगा और हरित ऊर्जा के लिए नया निवेश करना होगा। बीमा के दावे बढ़ेंगे, ट्रैवल और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में रुकावटें आएंगी जिससे सेवा क्षेत्र को कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

Climate change: इससे कुछ क्षेत्रों में वृद्धि हो सकती है, जैसे कि पर्यावरण संरक्षण, नए ऊर्जा स्रोतों के लिए नवाचार, और सुरक्षित और स्वच्छ परिवहन के प्रोत्साहन के लिए। हालांकि, इससे अन्य क्षेत्रों में कठिनाईयां भी उत्पन्न हो सकती हैं, जैसे कि वित्तीय सेवाएं, टूरिज्म, और अन्य व्यापारिक क्षेत्रों में। इसलिए, अधिक संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए समाधान सोचना होगा ताकि हम समृद्धि और सुरक्षा दोनों को साथ में बनाए रख सकें।

मजदूर, बैंक और कारखानों पर भी मार!

Climate change: जलवायु परिवर्तन का असर सिर्फ खेतों और शहरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ये मजदूरों, बैंकों और कारखानों को भी प्रभावित कर रहा है। जलवायु परिवर्तन की वजह से गर्मी और उमस ज्यादा बढ़ने से लोगों का बीमार होना आम हो सकता है। इससे काम करने की क्षमता कम होगी और जोखिम वाले इलाकों से पलायन भी बढ़ेगा।

Climate change:गर्मियों के कारण मजदूरों की सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है, जिससे काम करने की क्षमता में कमी आ सकती है और इससे उनके जीविका की स्थिति पर भी असर पड़ सकता है। इसके अलावा, बैंकों और कारखानों में भी गर्मियों के कारण समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, जैसे कि बिजली की कमी, उत्पादन में विघ्न, और भूमिका का अभाव। इससे व्यापारिक गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकता है।

इसलिए, जलवायु परिवर्तन के प्रति समझदारी और सख्ती से काम करना आवश्यक है ताकि हम सभी इस बदलती धरती पर बेहतर से बेहतर उत्तर ढूंढ़ सकें।

Climate change: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का अनुमान है कि 2030 तक अकेले तेज गर्मी और उमस की वजह से काम के घंटे कम होने से भारत की जीडीपी (GDP) को 4.5% तक का नुकसान हो सकता है। एक अनुमान के मुताबिक 2030 तक दुनियाभर में गर्मी की वजह से कुल 8 करोड़ नौकरियां खत्म हो सकती हैं, जिनमें से करीब 3.4 करोड़ सिर्फ भारत में ही हो सकती हैं।

इस अनुमान के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि जलवायु परिवर्तन का असर सिर्फ प्राकृतिक वातावरण पर ही सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों को भी प्रभावित कर रहा है। गर्मी की वजह से काम करने की क्षमता में गिरावट से नौकरियों की हानि होने का अंदेशा है, जिससे सामाजिक और आर्थिक स्थिति में संकट आ सकता है।

इससे बचाव के लिए सख्त नीतियों और प्रबंधन में वृद्धि की ज़रूरत है ताकि आने वाले समय में इस प्रकार के नुकसान को कम किया जा सके।

Climate change:बिजली बनाने वाले कारखाने, ट्रांसपोर्ट सेक्टर, और खनन उद्योग ग्रीनहाउस गैसों का प्रमुख स्रोत हैं। रिजर्व बैंक का कहना है कि अगर भारत जीवाश्म ईंधन की जगह नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल करे, तो करीब 40% कार्बन उत्सर्जन कम किया जा सकता है। इसके साथ ही, इलेक्ट्रिक गाड़ियों और कम ऊर्जा खर्च करने वाले बिजली के सामानों की तरफ रुख करने से 15% और कमी लाई जा सकती है।

Climate change: इससे पर्यावरण को मिलेगा बेहतर वातावरण और हमारी सेहत को भी मिलेगा लाभ। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल करने से हम प्रदूषण कम करेंगे और ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में मदद मिलेगी। साथ ही, इससे ऊर्जा के उपयोग में भी सुधार होगा और हम स्थायी ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करने के साथ आत्मनिर्भर भारत की दिशा में भी कदम बढ़ाएंगे।

जलवायु परिवर्तन से बचाव क्यों जरूरी

Climate change: जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को रोकने के लिए हमने अब तक सही दिशा में कदम बढ़ाये हैं, लेकिन अब हमें इसके प्रभावों से बचाव की तैयारी भी करनी चाहिए। हालांकि हाल ही में हुए कुछ अध्ययनों ने इस बात पर जोर दिया है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से लोगों को बचाने के लिए उनकी सहनशीलता बढ़ाने पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है।

Climate change: NBER अर्थशास्त्रियों के मैक्रो लेवल पर किये गए अध्ययन में यह पाया गया है कि लोगों को लू, बाढ़, भूस्खलन जैसी आपदाओं से बचाने के लिए खेती को सूखा-प्रूफ बनाने और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की जरूरत है। UN की डेजर्टिफिकेशन पर रिपोर्ट भी इस बात को दर्शाती है कि जलवायु परिवर्तन से प्रभावित इलाकों में लोगों की आर्थिक स्थिति बेहद प्रभावित हो रही है, और हमें उनकी मदद करने के लिए उन्हें सामाजिक सुरक्षा और विकास की सहायता प्रदान करनी चाहिए।

हालांकि जलवायु परिवर्तन के अनुकूल ढलने की जरूरत हो रही है, लेकिन इसके लिए अभी भी पर्याप्त पैसा नहीं दिया जा रहा है। अजरबैजान की राजधानी बाकू में होने वाले अगले Climate change: CoP (Conference of Parties) में इस मुद्दे पर नए सिरे से विचार-विमर्श किया जा सकता है। विशेषज्ञों ने बताया है कि जलवायु परिवर्तन को सामूहिक ढलाने के लिए कई प्राथमिक उपाय जरूरी हैं, जैसे कि पर्यावरणीय अनुसंधान में निवेश, ऊर्जा के प्रदाताओं को ऊर्जा बचत के लिए प्रोत्साहन, और उद्यमिता के लिए नई स्कीमें।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस संदेश को लेकर कार्रवाई के लिए अब ज्यादा समय नहीं है। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचाव की नीतियों को अमल में लाने के लिए कारगर कदम उठाने होंगे ताकि हम समृद्धि और संतुलनित विकास की दिशा में आगे बढ़ सकें।

 

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